MURTI KA ABHISHAAP

क्या यह मूर्ति सच में अभिशाप दे सकती हैं?

 
जानने के लिए आपको यह रोमांचक कॉमिक पढना ही होगा.. 

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18 comments:

PBC on 30 May 2010 at 00:46 said...

Thanks Walker for such rare issue!

After a long interval only last year Venkit had presented C2C English IJC version. Now you have shared in Hindi. :)

Rafiq Raja on 30 May 2010 at 01:11 said...

dhanywad priy walker mitr.

Bengali Indrajal Comics on 30 May 2010 at 09:01 said...

Thanks Mr. Walker for this post.

Tomar Blog-e new post access kora jachhena keno? Bolchhe Page not found.. previous post gulo-te kono problem nei.

chaltaphirtapret on 30 May 2010 at 09:20 said...

वाकर बंधू , इस बेशकीमती तोहफे के लिए मैं आपका समस्त इंद्रजाल कुटुंब की तरफ से तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ यह वोह 'अनमोल रतन' है जिसे आज दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति भी नहीं खरीद सकता और आप इस हीरे को हम सबके लिए ढूँढ के लाये ! आश्चर्यजनक ! अध्भुत !!

praveen on 30 May 2010 at 23:02 said...

Thanks Mr. Walker for this rare comic !!!!
Praveen

Comic World on 31 May 2010 at 12:45 said...

प्रिय मित्र वाकर,शुक्रिया वेताल की इस हिंदी कॉमिक के लिए.अगर कथानक के नज़रिए से देखा जाये तो ये कहानी वेताल की अन्य रोमांचक कहानियों के पासंग भी नहीं है क्योंकि इस कथा के पीछे फ़ाल्क,बैरी जैसे कोई नाम नहीं है.ये कथा तो प्रकाशित की गई थी 'कार्लटन प्रेस' द्वारा जिन्होंने किंग फीचर सिंडिकेट से वेताल कथाएँ लिखने एवं प्रकाशन करने हेतु अधिकार खरीद लिए थे,पर इनकी कथाएँ और चित्र वेताल की बहुचर्चित छवि के साथ कहीं दूर-दूर तक भी न्याय नहीं करती थीं.कारण-कार्लटन द्वारा बेहद सामान्य प्रतिभा वाले लेखकों/चित्रकारों का चुनाव.
इस कथा के लेखक थे 'जो गिल' एवं चित्र बनाये थे 'Pat Boyette' ने और अचरज की बात ये है की इन्होने 7-7 प्रष्टों की तीन कथाएँ एक अंक में प्रस्तुत की बजाये एक लम्बी कथा के जो शायद ज्यादा बेहतर होता.
बहरहाल,इंद्रजाल कॉमिक्स ने कार्लटन/गोल्ड क़ी कथाओं को प्रकाशित करने में इतनी रूचि क्यूँ दिखाई ये भी समझ से बाहर है.अगर इंद्रजाल फ़ाल्क क़ी ही कहानियां को प्रकाशित करते रहते तो हम हिंदी पाठकों को फ़ाल्क क़ी ज़्यादा से ज़्यादा कहानियां इंद्रजाल में पढ़ने का अवसर प्राप्त हो सकता था.

Mr. Walker on 1 June 2010 at 19:18 said...

@prabhat:ur welcome brother..

Mr. Walker on 1 June 2010 at 19:20 said...

@rafiq: shukria rafiq bhai..

Mr. Walker on 1 June 2010 at 19:24 said...

@BIC:thanks, & speaking of new post, new post thakle tobei na tumi access korte parbe..je guno previous posts er khetre ghotche..& the new post is not only ready, even u've commented in it :D ..thanks..

Mr. Walker on 1 June 2010 at 19:26 said...

@Chaltaphirtapret: thanks for the compliment..yeh sach me ek anmol heera hai..

Mr. Walker on 1 June 2010 at 19:27 said...

@praveen:ur welcome..& there will b some more gems like this..coming very soon..

Mr. Walker on 1 June 2010 at 19:30 said...

@CW: Thanks for the info zaheer bhai..&ur right..charlton stories are no match for those which are written by lee falk himself..

Mr. Walker on 1 June 2010 at 19:34 said...

to all the visitors..i really forgot to mention one thing..the front cover is cleaned by & improved by prabhat..meanwhile, the combined page(16-17) are cleaned by prabhat with a just bit improved by myself!

PBC on 1 June 2010 at 21:46 said...

@Walker: Agree with CW about quality of story & Falk story as better choice.

This Hindi issue attracted me for one reason: Only last year we were able to get complete Eng version, so there was danger to get it too late.

No need to thank me about improvement. You have main interest in Bengali IJC. Approx only 100 Bengali IJC are required to complete your collection. In last few months you were able to add approx half required issues forever. Some are saying taking for scanning is TOO difficult task being long in this feild.

You are doing it with CLEAN HEART and searching early Hindi & English issues in the city - where getting these languages are relatively more difficult.

So, we should thank you. Keep it up!

Mr. Walker on 1 June 2010 at 22:05 said...

@prabhat:thanks for ur compliment..m here to share rather than helping.. & i would like to help more specially with eng ijcs..let's see if i can find some old treasure..thanks again..

Rafiq Raja on 26 June 2011 at 15:16 said...

@rafiq: shukria rafiq bhai..

Rafiq Raja on 26 June 2011 at 15:16 said...

प्रिय मित्र वाकर,शुक्रिया वेताल की इस हिंदी कॉमिक के लिए.अगर कथानक के नज़रिए से देखा जाये तो ये कहानी वेताल की अन्य रोमांचक कहानियों के पासंग भी नहीं है क्योंकि इस कथा के पीछे फ़ाल्क,बैरी जैसे कोई नाम नहीं है.ये कथा तो प्रकाशित की गई थी 'कार्लटन प्रेस' द्वारा जिन्होंने किंग फीचर सिंडिकेट से वेताल कथाएँ लिखने एवं प्रकाशन करने हेतु अधिकार खरीद लिए थे,पर इनकी कथाएँ और चित्र वेताल की बहुचर्चित छवि के साथ कहीं दूर-दूर तक भी न्याय नहीं करती थीं.कारण-कार्लटन द्वारा बेहद सामान्य प्रतिभा वाले लेखकों/चित्रकारों का चुनाव.
इस कथा के लेखक थे 'जो गिल' एवं चित्र बनाये थे 'Pat Boyette' ने और अचरज की बात ये है की इन्होने 7-7 प्रष्टों की तीन कथाएँ एक अंक में प्रस्तुत की बजाये एक लम्बी कथा के जो शायद ज्यादा बेहतर होता.
बहरहाल,इंद्रजाल कॉमिक्स ने कार्लटन/गोल्ड क़ी कथाओं को प्रकाशित करने में इतनी रूचि क्यूँ दिखाई ये भी समझ से बाहर है.अगर इंद्रजाल फ़ाल्क क़ी ही कहानियां को प्रकाशित करते रहते तो हम हिंदी पाठकों को फ़ाल्क क़ी ज़्यादा से ज़्यादा कहानियां इंद्रजाल में पढ़ने का अवसर प्राप्त हो सकता था.

Rafiq Raja on 26 June 2011 at 15:16 said...

Thanks Walker for such rare issue!

After a long interval only last year Venkit had presented C2C English IJC version. Now you have shared in Hindi. :)

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